भगवद् गीता- स्वतंत्र इच्छा का सिद्धांत

18 April, 2021, 3:47 pm

विजय सिंगल

भगवद् गीता का मार्ग बाध्यता का मार्ग नही है, बल्कि यह तो स्वतंत्र इच्छा का मार्ग है। यह आत्म-साक्षात्कार की वो राह है जिसमें संबधित व्यक्ति की राय को नकारा नही जाता है बल्कि उसके ईमानदार और सुविचारित मत को पूरा सम्मान दिया जाता है। किसी इंसान पर कोई विचार थोपा नही जाता ।

परमात्मा ने मानव को अपने फैसले स्वयं लेने की स्वतंत्रता दी है । परन्तु यह स्वतंत्रता असीमित नही हो सकती है । मनुष्य को उस स्वतंत्रता का उपयोग जीवन के परम उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए पूरी सावधानी के साथ करना चाहिए ।

 जीवन के दर्शन को पूरी तरह से समझाने और भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करने के बाद भगवान श्री कृष्ण ने अंत में अर्जुन से कहा –

“इस प्रकार मैंने सभी रहस्यों से भी अधिक रहस्यमयी और गोपनीय यह ज्ञान तुम्हें बतला दिया है । इस पर पूरी तरह से विचार करने के पश्चात जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा तुम करो।“ श्लोक (18.63)

अर्जुन के साथ संवाद के दौरान श्रीकृष्ण ने जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए हर एक वस्तु के फायदे और नुकसान समझाये । उन्होंने मानवीय व्यवहार के वांछनीय एवं अवांछनीय गुणों का भी व्याख्यान किया । साथ ही उन्होंने आत्म-साक्षात्कार के विभिन्न मार्ग भी बतलाये ।

सब कुछ विस्तार में बताने के बाद श्री कृष्ण ने अर्जुन से इस बारे में गंभीरता से सोचने और फिर जैसा उसे ठीक लगे वैसा करने को कहा । श्री कृष्ण ने अर्जुन पर ही फैसला छोड़ दिया । कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर किसी पर अपनी इच्छा नही थोपता । परमात्मा ने मनुष्य को स्वतंत्र इच्छा प्रदान की है ताकि परिस्थितियों को देखते हुए वह उपयुक्त विकल्प चुन सके ।

परन्तु मनुष्य को अपने फैसले किसी आवेग में आकर नहीं लेने चाहिए। हर एक निर्णय सुविचारित होना चाहिए । यही कारण है कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन से अपनी शिक्षाओं का पालन बिना सोचे समझे करने को नही कहा । बल्कि उसको यह सलाह दी  कि वह उसको दिए ज्ञान को अच्छी तरह जांच करने के बाद ही तय करे कि क्या करना है और क्या नही करना है ।

भगवान केवल पथ दिखा सकते हैं, लेकिन उस पर चलने के लिए किसी को मजबूर नही करते । वह मनुष्य का मार्गदर्शन कर सकते हैं, उसे सिखा सकते हैं, और उसको सलाह दे सकते हैं । जब कभी वह लड़खड़ाता है तो उसको सहारा दे सकते हैं। लेकिन ईश्वर न तो मनुष्य को कोई कार्य करने के लिए बाध्य करते हैं और न ही वह कभी अपनी ओर से कार्य करते हैं। मनुष्य को स्वयं ही कार्य करना है, और स्वयं ही उसके परिणाम भुगतने हैं ।

इस प्रकार भगवद् गीता न केवल व्यक्ति के अपने निर्णय स्वयं लेने के अधिकार पर जोर देती है, बल्कि यह भी बताती है कि उस अधिकार का इस्तेमाल कैसे किया जाये। अपने फैसलों को आवेग और जुनून से नही बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान से निर्देशित किया जाना चाहिए । यदि हम अपने स्वार्थों से ऊपर नही उठ पाते और हमारा आचरण बुद् द्वारा निर्देशित नही होता तो हम वासना , जोकि मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है, के शिकार बन सकते है।

आत्मा के रूप में मनुष्य एक ऐसा विषय है जो जीवन का अनुभव करता है, और मन एवं शरीर उसके अनुभव की वस्तुएं हैं। परमात्मा चाहता है कि आत्मा मन और शरीर पर नियंत्रण प्राप्त करे । वह चाहता है कि सभी को पूर्णता प्राप्त हो । यही कारण है कि उसने मनुष्य को अति गोपनीय आध्यात्मिक ज्ञान प्रकट किया है। साथ ही परमात्मा यह भी चाहता है कि मनुष्य उसे प्राप्त करने का प्रयास किसी भय या मजबूरी से नहीं बल्कि अपनी इच्छा से करे । मनुष्य को परमात्मा के साथ एक होना चाहिए और उस एकता को प्राप्त करने के लिए सदा प्रयास करते रहना चाहिए।

श्रीकृष्ण के द्वारा घोषित ज्ञान को सभी रहस्यों से भी अधिक रहस्यमय क्यों कहा गया है? गीता में आत्मा,जीवात्मा और परमात्मा जैसी आध्यात्मिक अवधारणाओं पर विस्तार से चर्चा की गई है । यह भी बताया गया है कि मोझ कैसे प्राप्त किया जा सकता है । इतना गहरा ज्ञान प्रत्यक्ष बोध के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता । इसलिए इसे गोपनीय ज्ञान की संज्ञा दी गई है ।

श्रीकृष्ण वो शिक्षक हैं जिन्होंने अपने शिष्य अर्जुन को जीवन के सभी सत्य विस्तारपूर्वक समझाये । उन्होंने उसे कोई भी प्रश्न पूछने या किसी भी संदेह को सांझा करने से कभी नही रोका । उन्होंने धैर्य से उनकी बातें सुनी और हर एक सवाल का उत्तर दिया । एक-एक शंका को भी दूर किया । इस प्रकार सर्वोच्च प्रभु ने मनुष्य को सावधानी के साथ अपनी मुक्ति का रास्ता स्वयं चुनना चाहिए और दृढ़ विश्वास के साथ उस पथ पर चलना चाहिए ।

विचार और कर्म की ऐसी स्वतंत्रता के कारण ही कहा जाता है कि भगवद् गीता के उपदेश बंधनकारी नही हैं । यह तो मुक्ति प्रदान करने वाले हैं ।