भगवद् गीता के महत्वपूर्ण उपदेश

27 November, 2022, 7:23 pm

भगवद् गीता युद्धक्षेत्र के बीच श्रीकृष्ण के द्वारा प्रकट किए गए आघ्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण ग्रंथ है। अपने ही बंधुओं के संहार की पृष्ठभूमि जीवन के सतत नैतिक संघर्षों का प्रतीक है। गीता का मुख्य उद्देश्य मानव को उसकी वास्तविक प्रकृति के प्रति जागरूक करना और उसे नेक जीवन जीने के लिए प्रेरित करना है। इस पवित्र ग्रंथ की कुछ मूलभूत शिक्षाओं का सारांश नीचे दिया जा रहा है :-

मानव जीवन दुविधाओं एवं चुनौतियों से भरा है। परस्पर युद्धरत सेनाओं के बीच श्रीकृष्ण की सदा ताजा रहने वाली मुस्कान मानव जाति को शाश्वत आशा का संदेश देती है। कोई न कोई बहाना बनाकर पलायन करने की बजाय, मनुष्य को हर परिस्थिति का सामना डटकर करना चाहिए। अपने कर्तव्यकर्मों को त्यागने से व्यक्ति भौतिक अवनति एवं आध्यात्मिक पतन की ओर चला जाता है।

मनुष्य को सदा याद रखना चाहिए कि उस की मूल प्रकृति आत्मा है, जो शाश्वत और अविनाशी है। आत्मा न कभी पैदा होती है और न ही कभी मरती है। जब देह की मृत्यु होती है, तब भी उसका नाश नहीं होता। देहधारी आत्मा (जीवात्मा) पुरानी देह का त्याग कर नया शरीर धारण कर लेती है। इसलिए, भय या शोक का कोई कारण ही नहीं है।

जीवात्मा परमात्मा का एक अभिन्न अंग है। मनुष्य जब इस एकता का एहसास कर लेता है, तब उसका जीवन सफल हो जाता है।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। एक बुद्धिमान व्यक्ति परिवर्तन से भ्रमित नहीं होता। सुख और दुख सदा के लिए नहीं रहते। मनुष्य को इन्हें सहन करना सीखना चाहिए। सांसारिक वस्तुओं से प्राप्त सुख क्षणिक होते हैं अर्थात् उनका आदि व अन्त होता है; और अन्त में दुख का ही कारण बनते हैं। जो भौतिक सुखों की चिन्ता नहीं करता, वो अपने भीतर के आनन्द अर्थात् वह प्रसन्नता जो आत्मा में स्थित है, को प्राप्त कर लेता है। योग के द्वारा ईश्वर के साथ एक हुआ व्यक्ति असीम आनन्द का अनुभव करता है। 

मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है, उसके फल पर कभी नहीं। इसलिए व्यक्ति को अपने काम पर ध्यान देना चाहिए और परिणामों की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। व्यक्ति को केवल कर्मफल की आशा से कर्म नहीं करना चाहिए; और साथ ही उचित कार्य से कभी परहेज नहीं करना चाहिए। उसका एक स्पष्ट लक्ष्य और दृढ़ निश्चय होना चाहिए। व्यक्ति को समस्त आसक्ति का परित्याग करके और सफलता - असफलता में समभाव रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। केवल कर्म के प्रतिफल के लिए काम करने की अपेक्षा कर्तव्य निर्वाह के लिए कार्य करना अधिक तृप्ति एवं आनन्द प्रदान करता है। अपनी भूमिका का निर्वाह ठीक से करने के पश्चात् व्यक्ति को बाकी सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए। परिणाम को शालीनतापूर्वक स्वीकार करें, और आगे बढ़ें।

यह समझना आवश्यक है कि समस्त कार्य गुणों (भौतिक प्रकृति के विविध प्रकार) की परस्पर क्रिया से उत्पन्न होते हैं। देहधारी आत्मा के रूप में मनुष्य कर्मों का कर्ता नहीं है। इसलिए व्यक्ति को किसी बंधन में नहीं बंधना चाहिए। अपनी चेतना को आत्मा में स्थिर करके उसे अपने सभी कार्यों को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए।

सभी कार्यों को बिना किसी लगाव के, और बदले में किसी अपेक्षा के बगैर; कर्तव्य निर्वाह के रूप में किया जाना चाहिए। कर्तव्यकर्म (कोई भी कार्य जिसे किया जाना चाहिए) का परित्याग निश्चय ही उचित नहीं है। किसी भी देहधारी प्राणी के लिए सभी कार्यों से पूर्णतः निवृत्त होना वास्तव में संभव नहीं है। परन्तु जो व्यक्ति कर्मफल का त्याग कर देता है, वह त्यागी पुरूष कहलाता है।

विभिन्न विषयों के प्रति रूचि या अरूचि होना प्राकृतिक है। इसलिए, मनुष्य के मन में इच्छाएं पैदा होना स्वाभाविक है। लेकिन इच्छाओं का दास कभी शान्ति प्राप्त नहीं कर पाता। दूसरी ओर, व्यक्ति अपनी पसंद-नापसंद को नियंत्रित करके; संसार के विषयों में पूरी तरह से भाग लेते हुए भी, आत्मा की पवित्रता को प्राप्त कर लेता है। अतः व्यक्ति को न तो अपनी इच्छाओं का दमन करना चाहिये, और न ही उनका गुलाम बनना चाहिये।

ईश्वर ही ब्रह्मांड का सर्वव्यापी एवं सर्वज्ञ सृजक है। उसे अनन्य भक्ति के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। जिस भी रूप में व्यक्ति उसे मानता है, उसी रूप में ईश्वर उसे स्वीकार करता है। जो व्यक्ति मन को अन्यत्र भटकने से रोक कर निरंतर अभ्यास के द्वारा उसका ध्यान करता है, वह उस तक पहुँच जाता है। जो व्यक्ति भगवान की भक्ति निष्ठापूर्वक करता है, वह भौतिक संसार में पूरी तरह सक्रिय रहने पर भी, सदा उस में (भगवान में) स्थित रहता है।

मनुष्य स्वयं ही अपना सबसे अच्छा दोस्त होता है, और सबसे बड़ा दुश्मन भी। वह अपने मन के द्वारा अपने आप को ऊँचा उठा सकता है, या नीचा गिरा सकता है। जिस का मन अनुशासित नहीं है, उसके पास न तो स्थिर विवेक हो सकता है और न ही एकाग्रता की शक्ति। ऐसे अनियंत्रित मन वाले लोगों को न तो शांति प्राप्त होती है, और न ही आनन्द की अनुभूति होती है। मन अपने स्वभाव से ही चंचल, हठी, बलवान, अशांत, बेचैन तथा मुश्किल से काबू में आने वाला है; फिर भी इसे अनासक्त भाव के निरन्तर अभ्यास से नियंत्रित किया जा सकता है। 

जीवन में संतुलन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जो पुरूष खाने, सोने, जागने तथा आमोद-प्रमोद में नियमित रहता है, और जो कर्मों में यथा-योग्य चेष्टा करता है; वह समस्त दुखों से छुटकारा पा लेता है।

काम, क्रोध तथा लोभ नर्क के तीन द्वार बताए गये हैं। ये मनुष्य के विनाश का कारण बनते हैं। प्रारम्भ से ही इन्द्रियों को वश में करके इन दोषों से बचा जाना चाहिए।

जो अज्ञानी है, संशयी प्रकृति का है तथा जिसमें आस्था का अभाव है; वह व्यक्ति नष्ट हो जाता है। ऐसे संदेहवादी व्यक्ति को न तो इस लोक में कोई सुख प्राप्त हो सकता है, और न ही परलोक में। अतः मनुष्य को विवेक के द्वारा समस्त शंकाओं को दूर कर लेना चाहिये।

भगवद् गीता में बार-बार चित्त की समता पर बल दिया गया है। यह सलाह दी गई है कि व्यक्ति को सुख-दुख, लाभ-हानि एवं जय-पराजय को एक समान समझना चाहिए। ऐसा व्यक्ति जिसका मन समभाव में स्थित है, वह इसी जीवन में संसार पर विजय प्राप्त कर लेता है।

श्रीकृष्ण ने उद्घोषणा की है कि अच्छाई के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी बुराई में नहीं फँसता। ऐसा मनुष्य इस जीवन में या उसके बाद कभी दुख नहीं भोगता।

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